आर्य विवाह विधिमान्यकरण अधिनियम, 1937 (The Arya Marriage Validation Act, 1937)
आर्य विवाह विधिमान्यकरण अधिनियम, 1937 भारत में आर्य समाज के सदस्यों के बीच होने वाले अंतर्जातीय विवाहों को कानूनी मान्यता प्रदान करने के उद्देश्य से लाया गया एक महत्वपूर्ण कानून था। इस अधिनियम को 14 अप्रैल, 1937 को पारित किया गया था और यह 19वें अधिनियम के रूप में जाना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज में प्रचलित जातिगत बंधनों को तोड़कर, आर्य समाज के सिद्धांतों के अनुरूप अंतर्जातीय विवाहों को वैधता प्रदान करना था।
19वीं और 20वीं सदी में भारत में सामाजिक सुधार आंदोलनों ने जोर पकड़ा, जिनमें आर्य समाज एक प्रमुख संगठन था। आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में की थी और इसका मुख्य उद्देश्य वैदिक सिद्धांतों के आधार पर समाज को पुनर्गठित करना था। इस संदर्भ में, जाति-पाति के बंधनों को तोड़ना और अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करना आर्य समाज के प्रमुख सिद्धांतों में से एक था। हालाँकि, उस समय के हिंदू विवाह कानूनों के तहत अंतर्जातीय विवाहों को मान्यता नहीं दी जाती थी, जिसके कारण ऐसे विवाहों को चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। इसी समस्या के समाधान के लिए आर्य विवाह विधिमान्यकरण अधिनियम, 1937 लाया गया।
नाम और विस्तार: इस अधिनियम का पूरा नाम "आर्य विवाह विधिमान्यकरण अधिनियम, 1937" है। यह अधिनियम पूरे भारत में लागू है और इसमें उन सभी क्षेत्रों को शामिल किया गया है जो 1 नवंबर, 1956 से पहले भारत के 'ख' श्रेणी के राज्यों में शामिल थे। साथ ही, यह अधिनियम भारत के नागरिकों पर भी लागू होता है, चाहे वे कहीं भी हों।
विवाह की वैधता: अधिनियम के अनुसार, यदि दो व्यक्ति जो आर्य समाज के सदस्य हैं, उनके बीच विवाह हुआ है, तो यह विवाह वैध माना जाएगा, भले ही यह विवाह हिंदू विवाह के किसी उपबंध, प्रथा या रीति-रिवाज के विरुद्ध हो। इसका अर्थ यह है कि अगर विवाह के समय दोनों पक्ष आर्य समाजी थे, तो उनका विवाह जाति, उपजाति या धार्मिक मान्यताओं के आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकता।
पूर्व और पश्चात की व्यवस्था: अधिनियम यह भी स्पष्ट करता है कि चाहे विवाह इस अधिनियम के लागू होने से पहले हुआ हो या बाद में, उसे वैध माना जाएगा। इससे पहले हुए विवाहों को भी पुनः वैधता प्रदान की गई।
इस अधिनियम ने भारतीय समाज में सामाजिक समानता और धार्मिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। इसके माध्यम से आर्य समाज के सिद्धांतों को कानूनी मान्यता मिली और अंतर्जातीय विवाहों को बढ़ावा मिला। यह अधिनियम हिंदू समाज में जातिगत भेदभाव को कम करने और सामाजिक एकता को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ।
आर्य विवाह विधिमान्यकरण अधिनियम, 1937 एक ऐतिहासिक कानून था जिसने भारतीय समाज में सुधारवादी विचारधारा को मजबूती प्रदान की। इसके माध्यम से अंतर्जातीय विवाहों को कानूनी संरक्षण मिला और सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति हुई। यह अधिनियम आज भी भारतीय कानूनी व्यवस्था में अपना विशेष स्थान रखता है।