काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अधिनियम,1915 (The Banaras Hindu University Act, 1915)
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) अधिनियम, 1915 भारतीय संसद द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण कानून है जिसने वाराणसी (तत्कालीन बनारस) में एक शिक्षण और शोध संस्थान की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। यह अधिनियम 1 अक्टूबर, 1915 को लागू हुआ और इसका उद्देश्य हिंदू विश्वविद्यालय सोसाइटी को विघटित करके उसकी संपत्ति और अधिकारों को नए विश्वविद्यालय में स्थानांतरित करना था। इस अधिनियम के माध्यम से बीएचयू को एक स्वायत्त संस्थान के रूप में मान्यता दी गई, जिसका उद्देश्य शिक्षा, संस्कृति और शोध को बढ़ावा देना था।
19वीं और 20वीं सदी के संक्रमण काल में, भारत में शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे थे। इसी क्रम में, मदन मोहन मालवीय जैसे दूरदर्शी नेताओं ने एक ऐसे विश्वविद्यालय की कल्पना की जो भारतीय ज्ञान परंपराओं को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ सके। 1911 में, मालवीय जी ने बनारस में एक विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, जिसे ब्रिटिश सरकार और भारतीय नेताओं का समर्थन मिला। 1915 में इस अधिनियम के पारित होने के बाद, बीएचयू की स्थापना हुई, जो आज देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में से एक है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1915 ने न केवल एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान की स्थापना की बल्कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक नए युग की शुरुआत की। यह विश्वविद्यालय भारतीय संस्कृति और आधुनिक शिक्षा का संगम स्थल बना और देश-विदेश में अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए प्रसिद्ध हुआ। इस अधिनियम ने शिक्षा के क्षेत्र में समानता, समावेशिता और गुणवत्ता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।