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केन्‍द्रीय कृषि विश्‍वविद्यालय अधिनियम, 1992 (The Central Agricultural Universities Act, 1992)

केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1992, भारत सरकार द्वारा 26 दिसंबर, 1992 को अधिनियमित किया गया था। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य पूर्वोत्तर क्षेत्र में कृषि और संबंधित विज्ञानों के शैक्षणिक, अनुसंधान और विस्तार शिक्षा कार्यक्रमों को बढ़ावा देना था। यह विश्वविद्यालय मणिपुर के इंफाल में स्थापित किया गया था और इसका क्षेत्राधिकार अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर राज्यों तक विस्तृत है। इस अधिनियम के माध्यम से कृषि शिक्षा, अनुसंधान और प्रौद्योगिकी के विकास को गति देने का प्रयास किया गया, जिससे क्षेत्र के किसानों और कृषि से जुड़े लोगों को आधुनिक ज्ञान और तकनीक उपलब्ध कराई जा सके।
शिक्षा प्रदान करना: कृषि और संबंधित विज्ञानों में उच्च शिक्षा प्रदान करना।
अनुसंधान को बढ़ावा देना: कृषि विज्ञान में अनुसंधान को प्रोत्साहित करना और नवीन तकनीकों का विकास करना।
विस्तार शिक्षा: कृषि ज्ञान और तकनीकी जानकारी का प्रसार करने के लिए विस्तार कार्यक्रम आयोजित करना।
अन्य गतिविधियाँ: समय-समय पर अन्य आवश्यक गतिविधियों का संचालन करना।
विश्वविद्यालय को डिग्री, डिप्लोमा और प्रमाणपत्र प्रदान करने का अधिकार है।
यह अपने अधिकार क्षेत्र में महाविद्यालयों, अनुसंधान केंद्रों और प्रयोगशालाओं की स्थापना कर सकता है।
विश्वविद्यालय शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति, सेवा शर्तें और अनुशासन संबंधी नियम बना सकता है।
छात्रों के प्रवेश, शिक्षण और अनुशासन से संबंधित नियमों का निर्धारण करता है।

अधिनियम की धारा 7 में स्पष्ट किया गया है कि विश्वविद्यालय सभी जाति, धर्म और लिंग के लोगों के लिए खुला होगा और किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा।
धारा 25 में परिसंविधान बनाने की शक्ति दी गई है, जिसके तहत विश्वविद्यालय अपने प्रशासन और शैक्षणिक कार्यों के लिए नियम बना सकता है।
धारा 29 में वार्षिक रिपोर्ट और लेखा परीक्षा का प्रावधान है, जिससे विश्वविद्यालय की वित्तीय और प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।

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