पुलिस अधिनियम, 1949 (The Police Act, 1949)
पुलिस अधिनियम, 1949 भारत की स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया एक महत्वपूर्ण कानून है, जिसका उद्देश्य संघ राज्यक्षेत्रों (केंद्र शासित प्रदेशों) में एकीकृत पुलिस व्यवस्था स्थापित करना था। यह अधिनियम 27 दिसंबर, 1949 को पारित हुआ और इसने पुलिस अधिनियम, 1861 के प्रावधानों को संशोधित करते हुए, केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक सामान्य पुलिस बल के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। इसका मुख्य लक्ष्य विभिन्न संघ राज्यक्षेत्रों में पुलिस प्रशासन को सुव्यवस्थित करना और कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाना था।
सामान्य पुलिस बल का गठन (धारा 3-4):
इस अधिनियम के तहत, केंद्र सरकार को एक या अधिक संघ राज्यक्षेत्रों को मिलाकर "सामान्य पुलिस बल" बनाने का अधिकार दिया गया।
पुलिस बल की संरचना, अधिकारियों की नियुक्ति और उनकी भूमिकाएँ केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाती हैं।
पुलिस का नियंत्रण और प्रशासन (धारा 5):
पुलिस बल का अधीक्षण (Superintendence) केंद्र सरकार के पास होता है।
पुलिस प्रशासन का प्रमुख पुलिस महानिरीक्षक (Inspector General of Police) होता है, जिसे केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।
पुलिस अधिनियम, 1861 का लागू होना (धारा 6):
इस अधिनियम में यह स्पष्ट किया गया है कि पुलिस अधिनियम, 1861 के प्रावधान संघ राज्यक्षेत्रों में गठित पुलिस बल पर भी लागू होंगे, मानो वे किसी राज्य सरकार के अधीन हों।
इसका अर्थ है कि पुलिस अधिकारियों के अधिकार, कर्तव्य और अनुशासनात्मक नियम वही होंगे जो 1861 के अधिनियम में निर्धारित हैं।
दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम, 1946 से संबंध (धारा 7):
यह स्पष्ट किया गया है कि इस अधिनियम की कोई भी बात दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम, 1946 के प्रावधानों को प्रभावित नहीं करेगी।
लागू होने की तिथि (धारा 1(3)):
यह अधिनियम विभिन्न संघ राज्यक्षेत्रों में अलग-अलग तिथियों पर लागू हुआ, जैसे:
गोवा, दमन और दीव (1962)
पांडिचेरी (1963)
लक्षद्वीप (1967)
केंद्र शासित प्रदेशों में एकरूपता: इस अधिनियम ने विभिन्न केंद्र शासित प्रदेशों में पुलिस व्यवस्था को एकीकृत करने में मदद की।
1861 के अधिनियम का विस्तार: यह अधिनियम पुलिस अधिनियम, 1861 को संघ राज्यक्षेत्रों पर लागू करता है, जिससे पुलिस प्रशासन में एकरूपता बनी रही।
केंद्र सरकार का नियंत्रण: चूंकि संघ राज्यक्षेत्र सीधे केंद्र सरकार के अधीन होते हैं, इसलिए पुलिस बल पर भी केंद्र का प्रशासनिक नियंत्रण रहता है।
औपनिवेशिक विरासत: चूंकि यह अधिनियम 1861 के अधिनियम पर आधारित है, इसलिए इसमें भी वही सख्त और नियंत्रणकारी प्रावधान शामिल हैं जिनकी आलोचना की जाती है।
पुलिस सुधारों की कमी: यह अधिनियम पुलिस व्यवस्था में आधुनिक सुधारों को शामिल नहीं करता, जैसे जवाबदेही, पारदर्शिता और मानवाधिकार संरक्षण के प्रावधान।