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संप्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोगनिवारण) अधिनियम, 1950 ( The Emblem and Name (Prevention of Improper Use) Act, 1950)

संप्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, 1950 को 1 मार्च, 1950 को लागू किया गया था। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतीकों, नामों, ध्वजों, और शासकीय चिन्हों के अनधिकृत या अनुचित व्यावसायिक प्रयोग को रोकना था। यह कानून भारत की संप्रभुता, गरिमा और राष्ट्रीय पहचान की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, ताकि देश के महत्वपूर्ण प्रतीकों का दुरुपयोग या मजाक न बनाया जा सके।
इस अधिनियम के पीछे मूल विचार यह था कि भारतीय राष्ट्रीय ध्वज, सरकारी मुहरें, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रतीक (जैसे संयुक्त राष्ट्र, WHO), और राष्ट्रीय नेताओं के नाम/चित्र जैसे संवेदनशील प्रतीकों का उपयोग व्यापार, विज्ञापन, या अन्य वाणिज्यिक गतिविधियों में बिना अनुमति के न किया जाए। इसके अलावा, इस कानून ने जम्मू-कश्मीर सहित पूरे भारत और विदेशों में रहने वाले भारतीय नागरिकों पर भी लागू होने का प्रावधान किया।
1950 के दशक में यह अधिनियम भारत की नवगठित सरकार द्वारा लाया गया, ताकि राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा बनी रहे।
1960-70 के दशक में इसमें संशोधन कर नेताओं के नाम/चित्रों (जैसे गांधी, नेहरू) को शामिल किया गया, ताकि उनका राजनीतिक या वाणिज्यिक दुरुपयोग न हो।
1986 में संशोधन कर अधिनियम को और सख्त बनाया गया, जिसमें राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों के प्रतीकों को भी सुरक्षा दी गई।
यह अधिनियम भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय पहचान की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा प्रदान करता है। इसके माध्यम से सरकार यह सुनिश्चित करती है कि राष्ट्रीय प्रतीकों, नेताओं के नामों, और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की पहचान का व्यावसायिक या अपमानजनक उपयोग न हो। आज भी, यह कानून ट्रेडमार्क, विज्ञापन, और कॉर्पोरेट पहचान से जुड़े मामलों में प्रासंगिक बना हुआ है।

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