नोटेरी अधिनियम, 1952 (The Notaries Act, 1952)
नोटरी अधिनियम, 1952 भारत में नोटरी पब्लिक (Notary Public) के पद, उनके कर्तव्यों, अधिकारों, और नियुक्ति की प्रक्रिया को विनियमित करने वाला एक महत्वपूर्ण कानून है। इस अधिनियम का उद्देश्य नोटरी के कार्यों को मानकीकृत करना, उनकी नियुक्ति और नियंत्रण के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करना, तथा दस्तावेजों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने में उनकी भूमिका को स्पष्ट करना है। यह अधिनियम 9 अगस्त, 1952 को लागू हुआ और इसे संसद द्वारा अधिनियम संख्या 53 के रूप में पारित किया गया।
नोटरी की संस्था का इतिहास काफी पुराना है और यह विश्व के विभिन्न देशों में विधिक प्रणाली का एक अभिन्न अंग रही है। भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान नोटरी की भूमिका को औपचारिक रूप दिया गया था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद इसे एक व्यवस्थित कानूनी ढांचे में ढालने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी क्रम में 1952 में नोटरी अधिनियम बनाया गया, जिसने नोटरी के कार्यों, योग्यताओं, और नियुक्ति प्रक्रिया को स्पष्ट किया। समय के साथ, इस अधिनियम में संशोधन किए गए, जैसे कि 1968, 1983, और 1999 के संशोधन, जिन्होंने इसके दायरे और प्रावधानों को विस्तार दिया।
नियम बनाने की शक्ति (धारा 15)
केंद्र सरकार इस अधिनियम के तहत नियम बना सकती है, जिसमें नोटरी की योग्यताएँ, फीस, और कार्यप्रणाली से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
संशोधन एवं विस्तार
1968 के संशोधन द्वारा जम्मू-कश्मीर को इस अधिनियम के दायरे में लाया गया।
1999 के संशोधन द्वारा नोटरी के कार्यों को विस्तार दिया गया और प्रमाणपत्र की अवधि 5 वर्ष निर्धारित की गई।
नोटरी अधिनियम, 1952 नोटरी पब्लिक की भूमिका को स्पष्ट करने और उनके कार्यों को विनियमित करने का एक महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज है। यह अधिनियम दस्तावेजों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने, कानूनी प्रक्रियाओं को सुचारू बनाने, और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में नोटरी की भूमिका को मजबूती प्रदान करता है। समय-समय पर किए गए संशोधनों ने इसे और अधिक प्रभावी बनाया है, जिससे यह आज भी प्रासंगिक बना हुआ है।






