न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985
न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं न्यायाधीशों की कार्यप्रणाली को सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 अस्तित्व में आया। यह अधिनियम न्यायाधीशों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों के संबंध में कानूनी कार्यवाही से संरक्षण प्रदान करता है। इस कानून के तहत, कोई भी न्यायिक कार्यवाही या आदेश जो न्यायाधीश द्वारा अपने पदीय कर्तव्यों का पालन करते हुए किया गया हो, उसके विरुद्ध किसी भी न्यायालय में दीवानी, फौजदारी या अन्य कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती। यह अधिनियम न्यायाधीशों को उनके निर्णयों के लिए अनावश्यक कानूनी दबावों से मुक्त रखने हेतु बनाया गया था, ताकि वे निष्पक्ष एवं निर्भीक होकर न्याय कर सकें। इसका उद्देश्य न्यायपालिका की गरिमा एवं स्वतंत्रता को बनाए रखना है, जो लोकतंत्र के लिए अत्यावश्यक है। अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति न्यायाधीश के विरुद्ध झूठे आरोप लगाता है या उसे परेशान करता है, तो उसे दंडित किया जा सकता है।






