top of page

न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968

न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा को बनाए रखते हुए न्यायाधीशों के आचरण पर उचित नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 पारित किया गया। यह अधिनियम भारत के संविधान के अनुच्छेद 124(4) और 217(1)(ख) में प्रदत्त शक्तियों को कार्यान्वित करता है, जो उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के खिलाफ कदाचार या अक्षमता के आरोपों की जांच के लिए एक संरचित प्रक्रिया प्रदान करता है। इस कानून के तहत, किसी भी न्यायाधीश के विरुद्ध आरोपों की जांच के लिए एक त्रिसदस्यीय जांच समिति गठित की जा सकती है, जिसमें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होते हैं। यदि जांच समिति आरोपों को सही पाती है, तो मामला संसद के पास भेजा जाता है, जहां न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। यह अधिनियम न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच एक सुसंतुलित व्यवस्था स्थापित करता है।

  • Picture2
  • Telegram
  • Instagram
  • LinkedIn
  • YouTube

Copyright © 2026 Lawcurb.in

bottom of page