हरियाणा और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1970 (Haryana and Punjab Agricultural Universities Act, 1970)
हरियाणा और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1970 एक महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज है जिसका उद्देश्य पंजाब कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1961 के तहत स्थापित एकीकृत पंजाब कृषि विश्वविद्यालय को विभाजित करके दो स्वतंत्र कृषि विश्वविद्यालयों—हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय—की स्थापना करना था। यह अधिनियम 2 अप्रैल, 1970 को प्रभावी हुआ और इसका मुख्य उद्देश्य दोनों राज्यों—हरियाणा और पंजाब—में कृषि शिक्षा, अनुसंधान और विस्तार सेवाओं को सुव्यवस्थित करना था।
1966 में पंजाब राज्य के पुनर्गठन के बाद हरियाणा एक अलग राज्य बना। इस विभाजन के परिणामस्वरूप, मौजूदा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (जिसकी स्थापना 1961 में हुई थी) के कार्यक्षेत्र और संसाधनों को दोनों राज्यों के बीच विभाजित करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। इसी संदर्भ में, 1970 का यह अधिनियम पारित किया गया, ताकि प्रत्येक राज्य के लिए एक स्वतंत्र कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना की जा सके। इस अधिनियम ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय को विघटित कर दिया और उसके स्थान पर हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (हिसार में) और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (लुधियाना में) की स्थापना की।
वित्तीय प्रबंधन:
प्रत्येक विश्वविद्यालय के लिए एक वित्त समिति का गठन किया गया, जो बजट और वित्तीय मामलों की देखरेख करती है।
लेखा परीक्षा और वार्षिक रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत की जानी होती है।
नियम और विनियम:
विश्वविद्यालयों को अपने नियम (Statutes) और विनियम (Ordinances) बनाने का अधिकार दिया गया, जो शिक्षा, परीक्षा, कर्मचारियों की नियुक्ति और अन्य प्रशासनिक मामलों को नियंत्रित करते हैं।
इस अधिनियम ने हरियाणा और पंजाब को अपने-अपने कृषि संस्थानों के माध्यम से क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा और अनुसंधान को विकसित करने में सक्षम बनाया।
यह कृषि शिक्षा के क्षेत्र में विकेंद्रीकरण का एक उदाहरण है, जिससे दोनों राज्यों को स्वायत्तता मिली।
हिमाचल प्रदेश के संदर्भ में, अधिनियम ने पालमपुर कृषि महाविद्यालय को एक स्वतंत्र विश्वविद्यालय बनने तक पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के अधीन रखने का प्रावधान किया, जो बाद में हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ।
हरियाणा और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1970 ने कृषि शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत की। इसने न केवल दोनों राज्यों को स्वतंत्र संस्थान प्रदान किए, बल्कि कृषि के क्षेत्र में शिक्षा, अनुसंधान और प्रसार सेवाओं को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार विकसित करने का मार्ग प्रशस्त किया। यह अधिनियम भारतीय संघीय ढाँचे और क्षेत्रीय विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।






